halala kya hota hai | जानिए इस्लामिक हलाला का असली सच

 हलाला क्या है । हलाला कैसे होता है । halala kya hai 








Halala meaning | halala meaning in hindi

halala का जन्म हलाल शब्द से हुआ है । halal अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है  न्यायसंगत , वैध या जायज़ । 


इस्लाम के अनुसार अगर कोई मर्द अपनी औरत को तीन बार तलाक़ दे दे तो अब वह औरत उस मर्द के लिए हराम हो गयी और अगर वह मर्द उस औरत से किसी भी प्रकार का शारिरिक  संबंध बनाता है तो एक तरह से जिना के बराबर होगा  । 

Halala kya hota hai | halala kya hai 

इस्लाम के अनुसार अगर वह तलाकशुदा औरत अपनी मर्जी से किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तेफाक से अगर उनका भी रिश्ता निभ न पाया हो और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे-दे या मर जाए तब ऐसी स्थिति में ही वह औरत पहले पति से दोबारा निकाह कर सकती है। ये असल इस्लामिक हलाला है। 


शरिया के मुताबिक अगर एक पुरुष ने औरत को तलाक दे दिया है तो वो उसी औरत से दोबारा तब तक शादी नहीं कर सकता जब तक वह औरत किसी दूसरे पुरुष से शादी कर तलाक न ले ले। लेकिन यह जानना जरूरी है कि यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, लेकिन जान-बूझकर या योजना बनाकर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश नाजायज़ है और अल्लाह के नबी ने ऐसी साजिश करना गलत बताया है।


हलाला का अर्थ

अक्सर बिना सोचे-समझे मर्द तीन बार तलाक-तलाक-तलाक बोल देते हैं। बाद में जब उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है तो वे अपना संबंध फिर से उसी औरत से जोडऩा चाहते हैं। इसके लिए वो ऐसे मर्द को खोजते है जो उनकी तलाक़ शुदा औरत से कुछ दिनों के लिए शादी कर ले और बाद में उसे तलाक़ दे दे । लेकिन इस्लाम के हिसाब से जानबूझ कर या योजना बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इस लिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज हो सके यह साजिश नाजायज है।


भारत मे इस वक़्त लोग हलाला के बारे में गलत बयानी कर रहे है । इस्लाम को हलाला से जोड़कर बदनाम कर रहे है । इस्लाम के बारे में उसके विरोधियों का मानना है कि वह एक रूढ़िवादी धर्म है । और लोग उसमें बदलाव की मांग कर रहे है और सरकारें बदलाव लाने के लिए कानून बना रही है जबकि इस्लाम से आधुनिक कोई धर्म नही । निक़ाह के बारे में 1400 साल पहले ही इस्लाम  में कहा गया कि शादी एक मजबूत कॉन्ट्रैक्ट है जो मर्द और औरत के संबंधों को जायज़ बनाने के लिए है । क्योंकि निकाह एक कॉन्ट्रैक्ट है इसलिए मर्द और औरत कभी भी इसे आपसी सहमति से तोड़ सकते है 


अगर मर्द इस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ना चाहता है तो वह तलाक़ दे सकता है और अगर औरत निकाह को तोड़ना चाहती है तो वह खुला ले सकती है । 


रिश्ते के निभाने की या तोड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ मर्द पर ही नही थोपी जा सकती । कई बार रिश्ते टूटते है क्योंकि महिलाएं अपने अहम से बाहर नही निकल पाती और उन्हें अपनी गलती का एहसास तब होता है जब रिश्ता खत्म हो जाता है ।


इस्लाम हमेशा लोंगो को आगे बढने की आज़ादी देता है अगर एक रिश्ता निभ नही पाया तो आपको दूसरी शादी कर लेनी चाहिए । पहली वाली औरत से वापिस शादी के लिए जानबूझकर हलाला का रास्ता अपनाना जायज़ नही है और एक तरह से गुनाह है ।


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